Saturday, May 16, 2009

गुलाम अली मजबूर का निधन
कश्मीर के प्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक, कलाकार और लेखक गुलाम अली मजबूर का 15 मई को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। श्री मजबूर ( 57 ) कश्मीरी लोक रंगमंच के अग्रणी कलाकार थे। उन्हांने 200 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया और आकाशवाणी, दूरदर्शन और जम्मू कश्मीर के कला संस्कृति और भाषा अकादमी के ग्रेड के कलाकार रहे। कश्मीरी लोक रंगमंच और अभिनय कला को प्रोत्साहन देने वाले मजबूर को केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, राज्य कला, संस्कृति, एवं भाषा अकादमी, कश्मीर विश्वविद्यालय और जम्मू कश्मीर सरकार के शिक्षा विभाग ने पुरस्कृत और सम्मानित किया था। एक लेखक के रूप में उन्होंने पचास से अधिक नाटकों की रचना की और कश्मीरी साहित्य और भाषा के लिये अनेक लेख लिखे। स्तंभ लेखक के रूप में वे दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं से जुड़े रहे। श्री मजबूर कश्मीर के अग्रणी रंगमंच समूह राष्ट्रीय भांड रंगमंच के संस्थापक सदस्य थे।
हबीब तनवीर अब स्वस्थ
देश के वरिष्ठ रंगकर्मी हबीब तनवीर विगत सप्ताह अस्पताल में भरती रहे। वे गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। हालत बिगड़ती देख उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। एक सप्ताह में उनकी बीमारी पर काबू पा लिया गया। हबीब साहब अब खतरे से बाहर हैं। उनकी बीमारी को लेकर देश के रंगकर्मी चिंतित थे। भोपाल में सभी कलाकार और साहित्यकार बुद्धिजीवी लगातार उनकी तबियत का हालचाल लेते रहे।
विवेचना, जबलपुर का थियेटर वर्कशाप
विवेचना जबलपुर का थियेटर वर्कशाप आगामी 13 जून से 12 जुलाई 2009 तक आयोजित है। यह वर्कशाप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित है। इस कार्यशाला का निर्देशन सुप्रसिद्ध अभिनेता निर्देशक श्री सुनील सिन्हा करेंगे। वर्कशाप 16 वर्ष से अघिक आयु के युवाओं के लिये है। वर्कशाप में नाटक के सभी पक्षों की जानकारी प्रशिक्षण दिया जायेगा। व्यायाम, तकनीकी विषयों आदि के लिये दो विषय विशेषज्ञ अलग से आयेंगे। श्री सुनील सिन्हा ने अनेक नाटकों का निर्देशन किया है और शेर अफगन जैसे नाटकों में अपने श्रेष्ठ अभिनय के लिये जाने जाते हैं। उन्होंने अनेक फिल्मों और टी वी सीरियल्स में स्मरणीय अभिनय किया है। उल्लेखनीय है कि सुनील सिन्हा विगत वर्ष जबलपुर में विवेचना, जबलपुर द्वारा आयोजित नाट्य कार्यशाला का निर्देशन कर चुके हैं।

Thursday, May 7, 2009

आगस्टो बोएल का निधन

रियो डी जनेरियो। अपनी अनोखी शैली के लिए विख्यात ब्राजीली रंगमंच निर्देशक और पटकथा लेखक अगस्टो बोएल का 78 साल की उम्र में निधन हो गया। रियो के अस्पताल समारितानो में लंबे समय से ल्यूकेमिया से पीड़ित बोएल का निधन 2 मई 2009 को सांस में परेशानी के बाद निधन हुआ। कोलंबिया विश्वविद्यालय से रंगमंच कला अध्ययन करने वाले बोएल ने 60 के दशक में पटकथा लेखक निर्देशक और अभिनेताओं के श्रोताओं से संवाद के लिए ’थियेटर आॅफ आप्रेस्ड’ बनाया था। सन् 1964 से 1985 के बीच ब्राजील के तानाशाही शासन ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया था।
विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च को इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट यूनेस्को द्वारा जो अन्तर्राष्ट्रीय संदेश जारी किया जाता है इस वर्ष 2009 के लिए यह संदेश आॅगस्टो बोएल द्वारा दिया गया था।

एकजुट का बच्चों का बच्चों का थियेटर वर्कशाॅप
एकजुट, मुम्बई द्वारा 7 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुम्बई में बांद्रा और लोखंडवाला में दो वर्कशाप 8 से 17 मई 2009 तक आयोजित हैं। इस 10 दिवसीय वर्कशाॅप में बच्चों व किशोरों को अभिनय, कथाकथन, थियेटर गेम्स, संवाद अदायगी, शब्द उच्चारण, चरित्र निर्माण, इम्प्रोवाइजेशन, संगीत व नृत्य का प्रशिक्षण दिया जायेगा। इस वर्कशाप में शामिल होने के लिए मोबाइल नं 9323738846 पर संपर्क किया जा सकता है।
लोहाकुट
बलवंत गार्गी के नाटक ’लोहाकुट’ का मंचन लिटिल थेस्पियन, कोलकाता द्वारा 6 मई 2009 को शिशिर मंच कोलकाता में किया गया। परिकल्पना व निर्देशन एस एम अज़हर आलम का था। यह कहानी 1944 में लिखी गई थी। इस नाटक में एक ग्रामीण महिला 18 साल के प्रेमविहीन वैवाहिक जीवन के बाद अपने पति को छोड़कर युवावस्था के प्रेमी के साथ जाने का फैसला करती है। इस निर्णय में उसकी लड़की का भी योगदान होता है जो पिता द्वारा तय गई पारंपरिक शादी तोड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है। नाटक में जीवन की निर्मम सचाई और यथार्थ को प्रदर्शित किया गया है।
पुस्तक प्रदर्शनी
केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा मेघदूत रंगशाला, रवीन्द्रभवन नई दिल्ली में प्रदर्शनकारी कलाओं पर पुस्तक प्रदर्शनी व विक्रय आयोजित हुई। प्रदर्शनी 6 मई तक जारी रही।
अस्मिता, दिल्ली की कार्यशाला
अस्मिता, दिल्ली ने हैबीटैट वल्र्ड, इंडिया हैबिटैट वल्र्ड, नई दिल्ली में 9 मई से 5 जून 2009 तक एक थियेटर वर्कशाप का आयोजन किया है। इसमें 15 वर्ष से ऊपर के बच्चे और युवा शामिल हो सकते हैं। अभिनय पर केन्द्रित इस कार्यशाला का निर्देशन श्री अरविंद गौड़ करेंगे।
जंगलधूम डाट काम
एकजुट, मुम्बई द्वारा 1 मई को हार्नीमन सर्किल गार्डन, मुम्बई में बच्चों का नाटक ’जंगलधूम डाट काम का मंचन किया गया। हरियाला जंगल में एक नन्हीं कोयल रहती है जिसे उसकी मां स्वार्थवश एक कौवे के घोंसले में छोड़कर चली जाती है। कौवे की मां कागी नन्हीं कोयल सरगम की देखभाल करती है और उसे पालती पोसती है। बाजबहादुर जो जंगल का राजा है एक गायन प्रतियोगिता का आयोजन करता है। कागी सरगम को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करती है। सरगम इस प्रतियोगिता को जीत लेती है। बुराई पर अच्छाई की विजय होती है।
नाटक क्षिप्रा शुक्ला ने लिखा है। नाटक का निर्देशन नादिरा बब्बर ने किया है।
पतझड़
डा एस एम अजहर आलम के निर्देशन में लिटिल थेस्पियन, कोलकाता ने 30 अप्रैल 2009 को ’पतझड़’ नाटक का प्रथम मंचन किया। यह नाटक टेनेसी विलियम्स की कथा पर आधारित है। यह एक परिवार की कहानी है जिसमें मां गायत्री, पुत्र इंदीवर और अपाहिज लड़की यामिनी है। यामिनी के मन में पति के रूप में एक टेलिफोन कंपनी में काम करने वाले नौजवान की कल्पना है। गायत्री चाहती है कि उसके बच्चे अच्छे से रहें। वो इंदीवर को यामिनी के लिये लड़का तलाश करने के लिये कहती रहती है। एक दिन एक लडका आता है जो बहुत अच्छा व्यवहार करता है। गायत्री को उम्मीद है कि वो यामिनी से शादी कर लेगा। लेकिन वो बताता है कि उसकी सगाई हो चुकी है। गायत्री के जीवन में जैसे पतझड़ आ
जाता है।
कागज के पक्षी
बैकस्टेज, इलाहाबाद ने प्रवीण शेखर के निर्देशन में ’कागज के पक्षी’ का मंचन 27 अपै्रल 2009 को किया। इसका रूपांतर देवेन्द्र प्रकाश सिंह ने किया है। यह एक जापानी लड़की सडाको की कहानी है जो 2 साल की थी जब हिरोशिमा पर बम गिराया गया। जब सडाको 12 साल की हुई तब पता चला कि अणुबम के दुष्प्रभाव से उसे ल्यूकेमिया हो गया है। उसकी मौत करीब है। उसे बताया गया कि जापानी लोकश्रुति के अनुसार यदि वह एक हजार कागज के पक्षी बनायेगी तो वह बच जायेगी। परंतु एक दिन जब वह 644 पक्षी ही बना पाई थी उसकी मृत्यु हो गई उसके साथी बच्चों ने उसके बाकी कागज के पक्षी बनाये। सडाको की याद में एक स्मारक बनाया गया है।
पेंसिल से ब्रश तक
25 व 26 अप्रैल 2009 को एकजुट, मुम्बई द्वारा पृथ्वी थियेटर में अपने प्रसिद्ध नाटक ’पेंसिल से ब्रश तक’ का मंचन किया गया। यह नाटक सुप्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन के जीवन पर आधारित है। इसका निर्देशन नादिरा बब्बर ने किया है। इसमे टाॅम आल्टर प्रमुख भूमिका में हैं। यह नाटक 18 व 19 अप्रैल 2009 को एनसीपीए मुम्बई में मंचित हुआ। जबकि 16 व 17 अपै्रल 2009 को नादिरा बब्बर अभिनीत व निर्देशित नाटक ’बेगम जान’ का मंचन एनसीपीए में हुआ। यह गुजरे जमाने की शास्त्रीय गायिका की कहानी है।

Monday, April 27, 2009

विष्णु प्रभाकर


विगत 11 अपै्रल 2009 को वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर नहीं रहे। वे 97 वर्ष के थे। विष्णु प्रभाकर इप्टा के संरक्षक मंडल के सदस्य थे।
विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून 1912 को उŸार प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गांव में हुआ था। उनके पिता दुर्गाप्रसाद एक धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी माता महादेवी परिवार की पहली पढ़ी लिखी महिला थीं जिन्होंने अपने घर में पर्दा प्रथा खत्म कर दी थी। बारह वर्ष की आयु में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने मामा के घर हिसार चले गये। जहां उन्होंने मेट्रिक की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद अठारह रूपये महीने पर सरकारी नौकरी शुरू की। इसी के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और प्रभाकर, हिन्दी भूषण, प्रज्ञा की परीक्षााओं के साथ अंग्रेजी में बी ए किया।
साहित्य में उनकी अभिरूचि शुरू से थीं उन्होंने हिसार में एक नाट्य संस्था में काम किया और सन् 1939 में अपना पहला नाटक ’हत्या के बाद’ लिखा। सन् 1938 में उनका विवाह सुशीला प्रभाकर से हुआ जिन्होंने सन् 1980 में अपनी मृत्यु तक उनका साथ निभाया। उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं। उन्होंने सन् 1955 से 1957 तक आकाशवाणी नई दिल्ली में नाट्य निर्देशक के रूप में कार्य किया।
वे विष्णु नाम से लिखा करते थे। एक बार एक संपादक ने उनसे कहा कि इतने छोटे नाम से क्यों लिखा करते हो। तुमने कोई परीक्षा पास की है। उन्होंने कहा - प्रभाकर। तबसे उनका नाम विष्णु प्रभाकर हो गया।
विष्णु प्रभाकर को उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत सरकार के द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। सन् 2005 में एक बार उनका सम्मान तब चर्चा में आया जब वे राष्ट्रपति से मिलने गये थे और उन्हें रास्ते में रोक लिया गया था। उन्होंने तब यह सम्मान वापस करने की घोषणा की थी।
वे मुख्य रूप से कथा लेखक थे। परंतु उन्होंने कविता के अलावा सभी विधाओं में लिखा। वे पहले मुंशी प्रेमचंद के लेखन से प्रभावित थे। बाद में शरतचन्द्र से प्रभावित रहे। उन्होंने 14 वर्ष तक यात्राएं कर सामग्री एकत्र की और शरतचन्द्र पर अमर उपन्यास लिखा ’आवारा मसीहा’। शरतचन्द्र की जीवनी को उन्होंने आवारा मसीहा में उपन्यास शैली में लिखा है। अपने लेखन और जीवन में वे महात्मा गांधी से प्रभावित रहे। उनके 8 उपन्यास, 19 कहानी संग्रह, 12 नाटक, 13 जीवनियां और संस्मरण पुस्तकें, दो निंबध पुस्तकें, 23 बच्चों की किताबें, 4 यात्रा संस्मरण, 15 विविध विषयों पर लिखी पुस्तकें प्रकाशित हैं।
स्व विष्णु प्रभाकर इप्टा से शुरूआती दौर से जुड़े थे। सन् 1957 में जब इप्टा का राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में हुआ तो वे स्वागत समिति के कोषाध्यक्ष और सम्मेलन के प्रमुख कार्यकर्ता थे। वे इप्टा के संरक्षक मंडल के सदस्य थे। विगत वर्ष अपने हस्तलिखित पत्र द्वारा उन्होंने इप्टावार्ता को शुभकामनाएं दी थीं।
विष्णु प्रभाकर जी का दाह संस्कार नहीं हुआ क्योंकि मृत्यु से काफी पूर्व उन्होंने अपनी देह आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस (एम्स) को दान कर दी थी। उनकी मंशा के अनुसार उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन के काम आएगी।
भारतीय जननाट्य संघ इप्टा इस महान लेखक को भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित करती है।

Thursday, April 23, 2009

अन्तर्राष्ट्रीय संदेश

विश्व रंगमंच दिवस: 27 मार्च 2009
प्रसिद्ध पुर्तगाली नाट्य निर्देशक आगस्टो बोएल का अन्तर्राष्ट्रीय संदेश
सभी मानव-समाज अपने रोजमर्रा के जीवन में नाटकमय हैं और विशेष क्षणों में नाटक प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक संगठन के रूप में वे नाटकमय होते हैं और वैसे ही नाटक प्रस्तुत करते हैं जैसे आप देखने आते हैं।
कोई जाने या न जाने, इन्सानी रिश्ते नाटकीय ढंग से बुने हुए होते हैं। स्थान, देहभाषा का इस्तेमाल, शब्दों और आवाज के उतार-चढ़ाव का चयन, विचारों और संवेगों की टकराहट - जो कुछ भी मंच पर हम दिखाते हैं, उसे अपने जीवन में जीते हैं। हम खुद रंगमंच हैं।
विवाह और अन्तिम संस्कार ही नहीं बल्कि रोजमर्रा के हमारे चिर-परिचित रीति-रिवाज भी नाटकमय होते हैं, चाहे सचेतन रूप से हमें इसका एहसास न हो। तड़क-भड़क और विभिन्न घटनाओं के अवसर, सुबह की काॅफी, प्रातःकालीन अभिवादन, शर्मीला प्यार और उŸोजना के तूफान, संसद का सत्र या राजनयिक मुलाकात-सब रंगमंच है।
हमारी कला के मुख्य कार्याें में से एक है लोगों को रोजमर्रा के जीवन के ’नाटकों’ के प्रति संवेदनशील बनाना, इन ’नाटकों’ में अभिनेता खुद दर्शक होते हैं, इन प्रस्तुतियों मंें मंच और दर्शक दीर्घा एक हो जाते हैं। हम सभी कलाकार हैं। रंगकर्म करते हुए हम वह सब देखना सीखते हैं, जिसे आम तौर से देख नहीं पाते क्योंकि उस पर ऊपरी दृष्टि डालने के ही आदी हैं। जो हमारा जाना-पहचाना है, वह अनदेखा बना रहता है: रंगकर्म का मतलब है रोजमर्रा के जीवन के मंच पर प्रकाश डालना।
पिछले सितम्बर में हम एक नाटकीय उद्घाटन से अचम्भित रह गये-हम, जो सोचते थे कि युद्धों, नरसंहार, कत्लेआम के बावजूद एक सुरक्षित दुनिया में रहते हैं। सोचते थे कि ये सब चीजें हैं जरूर लेकिन दूर-दराज के जंगली इलाकों में। हम अपने धन को किसी सम्मानित बैंक में जमा कर या स्टाक एक्सचेंज में किसी व्यापारी को सौंपकर आश्वस्त थे कि हमसे कहा गया कि इस धन का अस्तित्व ही नहीं, यह तो हवाई था। यह कुछ अर्थशास्त्रियों का नकली आविष्कार था, जो स्वयं नकली नहीं थे लेकिन विश्वसनीय और ईमानदार भी नहीं थे। यह सब किसी बुरे थियेटर की तरह था, ऐसा विषादभरा कथानक, जिसमें कुछ लोगों ने काफी कुछ जीत लिया और ज्यादातर लोगों ने सब खो दिया। धनी देशों के राजनीतिज्ञों ने गुप्त बैठकें कर कुछ जादुई हल ढ़ंूढ लिये और इन निर्णयों के शिकार हम बालकनी की आखरी पंक्ति के दर्शक ही बने रह गये।
बीस वर्ष पहले मैंने रियो द जेनेरियो का ’पेद्रे’ मंचित किया था। मंच सज्जा दीन-हीन थी, जमीन पर बिछी खालें और चारों तरफ बांस। हर प्रस्तुति से पहले मैं अपने अभिनेताओं से कहती थी: ’जो कल्पनालोक हम रोज़ रोज़ रचते थे, वह खत्म हो गया। इन बांसों के पार जाते ही तुममें से किसी को भी झूठ बोलने का अधिकार नहीं होता। रंगमंच छिपा हुआ सच है।’
जब हम अपनी प्रस्तुतियों के परे झांकते हैं तो शोषकों और शोषितों को देखते हैं: सभी समाजों, नृवंशी समूहों, लिंगों, सामाजिक वर्गों और जातियों मंें हमें अन्यायी और क्रूर दुनिया दिखायी देती है। हमंें एक दूसरी दुनिया की रचना करनी है क्योंकि हम जानते हैं कि यह सम्भव है। लेकिन यह हम पर ही है कि ऐसी दुनिया अपने हाथों से और रंगमंच व अपने जीवन में अभिनय करते हुए बनायें।
इस ’नाटक’ में हिस्सा लीजिये, जो शुरू होने को है और जैसे ही आपकी घर वापसी हो, अपने दोस्तों के साथ खुद के नाटकों का अभिनय कीजिए, फिर आप वह सब देख सकेंगे, जो पहले कभी न देख पाये-वह सब जो प्रत्यक्ष है। नाटक एक आयोजन भर नहीं है, यह जीने का ढंग है।
हम सब अभिनेता हैं: नागरिक होने का अर्थ समाज में रहना नहीं, उसे बदलना है।
इन्टरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट (यूनेस्को), पेरिस द्वारा जारी तथा भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी द्वारा प्रसारित

Wednesday, April 22, 2009

विवेचना जबलपुर का 15 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह विचारोत्तेजक नाटकों का समारोह

विवेचना जबलपुर का 15 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह
विचारोत्तेजक नाटकों का समारोह
विवेचना, जबलपुर का 15 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह विगत 5 नवंबर से 9 नवंबर 2008 आयोजित हुआ। इस समारोह ने अपनी निर्बाध निरंतरता से देश में एक अलग स्थान बनाया है। विवेचना के नाट्य समारोह में देश के सभी प्रमुख नाट्य निर्देशकों और नाट्य संस्थाओं ने अपने नाटकों के प्रदर्शन किये हैं। सर्वश्री हबीब तनवीर, बा.व.कारंत, बंसी कौल, सतीश आलेकर, देवेन्द्रराज अंकुर नादिरा बब्बर, दिनेश ठाकुर, दर्पण मिश्रा, उषा गांगुली, देवेन्द्र पेम, अरविंद गौड़, पियूष मिश्रा, रंजीत कपूर,, अनिलरंजन भौमिक, बलवंत ठाकुर, श्रीमती गुलबर्धन, अलखनंदन, लईक हुसैन, अशोक राही, विवेक मिश्र अजय कुमार, और वसंत काशीकर जैसे प्रमुख नाट्य निर्देशकों के नाटक पिछले 15 वर्षों में मंचित हुए हैं। 15 वर्षों में 78 नाटकों के मंचन हो चुके हैं। अनेक निर्देशकों ने एक से अधिक बार इस नाट्य समारोह में अपने नाटकों के मंचन किये हैं। इन नाटकों को हजारों दर्शकों ने देखा है। इन नाट्य समारोहों से एक बड़ा दर्शक वर्ग पैदा हुआ है जो हर नाटक को देखने की इच्छा रखता है। जबलपुर में आज विवेचना के राष्ट्रीय नाट्य समारोह के नाटकों को देखने के लिये प्रतिदिन आठ सौ दर्शक आते हैं। तरंग प्रेक्षागृह जहां ये नाटक होते हैं वो एक आलीशान एसी आॅडीटोरियम है जिसमें नाटक देखने और नाटक करने में सभी को संतोष मिलता है।
विवेचना ने इस बार मानव कौल को उनके दो नाटकों के साथ आमंत्रित किया था। 5 व 6 नवंबर को क्रमशः शक्कर के पंाच दाने और इल्हाम नाटकों का मंचन हुआ। शक्कर के पांच दाने एकल नाटक है जिसमें कुमुद मिश्रा का एकल अभिनय है। मानव कौल की नाट्य संस्था अरण्य द्वारा मानव कौल के द्वारा लिखे नाटकों का मंचन किया जाता है। शक्कर के पंाच दाने में राजकुमार नाम का पात्र इस दुनिया में जीने में अपने आपको असमर्थ पाता है। उसे यह दुनिया ही अजीब लगती है। नाटक में लेखक ने राजकुमार नाम के एक अनोखे चरित्र की रचना की है। उसकी मंा, उसका कवि चाचा, उसका ट्रक वाला दोस्त, उसका स्कूल हीरो रघु , बुजुर्ग राधे ही हैं जिनपर वो विश्वास कर पाता है। राजकुमार अपनी कहानी कहता है और साथ ही दुनिया में रहने वाले हर व्यक्ति और उसकी विशेषताओं और कमियों का जिक्र करता है। मानव कौल ने साहित्य, दर्शन और आध्यात्म के अध्ययन के दौरान जो पाया है उसे अपने नाटकों में पिरोया है। इसीलिये नाटक की बहुत सी बातें प्रभावित तो करती हैं पर किसी मंजिल पर नहीं पंहुचतीं। दोनों ही नाटक कहीं प्रयोगात्मक और एब्सर्ड हो जाते हैं। जब लेखक निर्देशक ही अपने कथ्य के बारे में स्पष्ट न हो तो दर्शक को क्या संप्रेषित हो सकता है? दोनों नाटक अंततः क्या कहना चाहते हैं वो स्पष्ट नहीं हो पाया। शक्कर के पांच दाने में कुमुद मिश्रा अपने चेहरे और आवाज के लोच से ज्यादा कह पाते हैं पर इल्हाम में उन्हें ये सुविधा भी नहीं मिली। नाटक संवाद और अभिनय का माध्यम तो है ही, ये निर्देशक के अपने विचारों का मंच भी है। मानव कौल इस मंच का बहुत न्यायपूर्ण इस्तेमाल इन नाटकों में नहीं कर पाये। दूसरा नाटक इल्हाम है। नाटक के नायक भगवान का,े जो एक बैंक में काम करने वाला सामान्य पारिवारिक आदमी है एक दिन पार्क में बैठे बैठे ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वो अपनों को पहचान नहीं पाता। और अजीब अजीब बातें और हरकतें करता है जिससे बहुत मनोरंजक परंतु विचारणीय स्थितियों का निर्माण होता है। भगवान की बातें किसी की समझ में नहीं आतीं और लोगों की बातें भगवान की समझ में नहीं आतीं। नाटक के अंत में भगवान सामान्य हो जाता है। इल्हाम में प्रयोगात्मकता और अमूर्तता कुछ ज्यादा ही थी।
विवेचना के राष्ट्रीय नाट्य समारोह के तीसरे दिन अलखनंदन के निर्देशन में नटबंुदेले भोपाल ने रामेश्वर प्रेम के नाटक चारपाई का मंचन किया। चारपाई मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है जिसमें रिटायर्ड बूढे के लिये घर में रहने को भी जगह नहीं है। मां एक लाचार जीवन जीने को अभिशप्त है। लड़कों की अपनी समस्याएं हैं और बहुओं बच्चों की अपनी। नाटक में निर्देशक ने एक सतत उदासी, विषाद का निर्वहन किया है। प्रकाश बहुत सीमित रखा गया है। पूरा नाटक रात के अंधरे में चलता रहता है। नाटक में एक अजब सुस्ती का आलम है जो दर्शक को झुझला देता है। मां के रोल में बिशना चैहान ने कुछ अच्छा करने की कोशिश की जबकि पिता के रूप में जावेद जैदी केवल खानापूरी करते नजर आए। अन्य पात्र भी केवल मंच पर थे। मंच पर नाटक का सैट बहुत असुविधाजनक था और नाटक करने वालों की दिमागी उलझन को अभिव्यक्त कर रहा था। नाटक में बहुत अच्छे संगीत का इस्तेमाल किया गया जो नाटक से बिल्कुल बेमेल था।
चैथे दिन अस्मिता दिल्ली द्वारा अरविंद गौड़ के निर्देशन में अनसुनी का मंचन किया गया। अनसुनी उन लोगों की कहानी है जिनकी संख्या करोड़ों में है परंतु जिनकी आवाज अनसुनी है। यह नाटक हर्षमंदर के उपन्यास अनहर्ड वाइसेस पर आधारित है। इसमें पांच कहानियांे का मंचन है जिनमें हर कहानी किसी एक खास व्यक्ति और वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। कुष्ठ रोगी, साम्प्रदायिक दंगों को भुगतती एक महिला, सिर पर मैला ढोने वाली औरत, सड़कों पर पलते बच्चे और आदिवासी लोगों की समस्याओं को इस नाटक में आवाज दी गई है। नाटक में पांच छोटी छोटी कहानियांे को मंचित किया गया है। कहानियां बहुत छोटी होने से बहुत असरदार बन पड़ी हैं। हर कहानी के मंचन के बाद सूत्रधार न रखकर 28 नर्तकों के साथ एक सामयिक गीत बहुत आधुनिक तरीके से प्रस्तुत किया गया जिसका परिणाम ये हुआ कि नाटक दर्शकों द्वारा बहुत पसंद किया गया।
अंतिम दिन रविवार की सुबह 10 बजे अस्मिता के दूसरे नाटक आपरेशन थ्री स्टार का मंचन हुआ। सुबह ठीक दस बजे लगभग 600 दर्शक नाटक देखने आ चुके थे। ये इस बात का प्रदर्शन था कि दर्शकों में नाटक देखने के लिये कितना उत्साह है। इसके पूर्व भी तेरहवें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में प्रातःकालीन मंचन आयोजित किया गया था जिसे बहुत पसंद किया गया था। आपरेशन थ्री स्टार डाॅरियो फो के नाटक एक्सीडेंटल डेथ आॅफ एन एनार्किस्ट का रूपांतर है। यह नाटक बहुमंचित हैं और पुलिस व कानून की कारगुजारियांे को बेनकाब करता है। नाटक में अरविंद गौड़ ने बहुत तेज गति रखी है। नाटक बहुत रोचक है। नाटक में लेखक ने दो अंत रखे हैं। नाटक का अंत बहुत कुछ कहता है। नाटक को सामयिक बनाने के लिये निर्देशक अरविंद गौड़ ने कुछ संवाद रखे हैं।
नाट्य समारोह के अंतिम दिन 9 नवंबर को शाम विवेचना ने अपना स्वयं का नाटक वसंत काशीकर के निर्देशन में मंचित किया। शाहिद अनवर के नाटक सूपना का सपना के इस प्रथम मंचन को दर्शकों ने पसंद किया। नाटक एक गांव की कहानी है जहां गांव के प्रमुख बाबू साहब एक कालकोष गाड़ने जा रहे हैं जिसमें उनके परिवार की जानकारी डाली जा रही है। गांव का भोला भाला युवक सूपना यह मांग कर बैठता है कि कालकोष में गांव के लोगों का विवरण भी डाला जाना चाहिये। इसी बात से तकरार शुरू होती है जो समाज में गैरबराबरी को अभिव्यक्त करती है। निर्देशक वसंत काशीकर ने नाटक में कसावट पर बहुत ध्यान रखा। नाटक में अंतर्निहित संदेश को बहुत रोचकता से संप्रेषित किया गया है। सूपना का सपना को समारोह को दर्शकों ने समारोह का सबसे अच्छा नाटक माना।
विवेचना का पन्द्रहवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह विचारोत्तेजक नाटकों का समारोह रहा। नाटक का उद्घाटन जबलपुर जिले के कलेक्टर श्री हरिरंजन राव और म प्र वि मं के श्री संतोष तिवारी ने दीप जलाकर किया। शुरूआत में विवेचना के उपसचिव श्री बांकेबिहारी ब्यौहार ने नाट्य समारोह के आयोजन के बारे में बताया। विवेचना के सचिव श्री हिमंाशु राय ने देश में नाटकों की स्थिति और इस समारोह में नाटकों के चयन के संबंध में बताया। 15 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह विवेचना व केन्द्रीय क्रीड़ा व कला परिषद म प्र विद्युत मंडल का संयुक्त आयोजन था। विवेचना ने म प्र विद्युत मंडल के सहयोग के लिये आभार व्यक्त किया है। विवेचना ने जबलपुर शहर के दर्शकों और दानदाताओं का आभार व्यक्त किया।

Sunday, April 19, 2009

शुरूआत

इप्टावार्ता हिंदी का ब्लाग इस पोस्ट के साथ शुरू हो रहा है। इस ब्लाग में आप इप्टावार्ता के अंक पढ़ सकेंगे। इप्टा ही नहीं देश की सभी रंग संस्थाओं की गतिविधियों की जानकारी इप्टावार्ता हिंदी में उपलब्ध रहेगी।